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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 7
आषाढीपर्वकाले यदि किरणपतेरस्तकालोपपत्ती वायव्यो वृद्धवेगः पवनघनवपुः पन्नगार्खानुकारी । जानीयाद्वारिधाप्रमुदितमुदितामुक्तमण्डूककण्ठां ससयोद्धासैकचिह्नां सुखबहुलतया भाग्यसेनामिवोवर्वीम् ॥
इस योग में (आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के समय में) सधन शरीर बाली ( धूली के संयोग और सादिक होने के कारण), सपों के टुकड़ों का अनुकरण करने वाली यदि वायव्य कोण की हवा चले तो उस वर्ष में जल की धारा से आनन्दित, अति शब्द करने बाले मेढकों से युत, धान्यों को बीजोत्पतिरूप चिहों से मण्डित पृथ्वी पर सुखों की अधिकता होने के कारण भाग्य रोना की तरह पृथ्वी को जानना चाहिये।
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