नष्टचन्द्रार्ककिरणं नष्टतारं न चेत्रभः । न तां भद्रपदां मन्ये यत्र देवो न वर्षति ॥१०॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां वात- चक्राध्यायः सप्तविंशः ॥
यदि चन्द्र और सूर्य के किरणों से तथा ताराओं से रहित आकाश नहीं हुआ तो उसको भाद्रपद नहीं कहना चाहिये क्योंकि; उसमें मेघ वृष्टि नहीं करता है।
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