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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 5
सूक्ष्मैलालवलीलवङ्गनिचयान् व्यापूर्णयन् सागरे भानोरस्तमये प्लवत्यविरतो वायुर्यदा नैऋतः । क्षुत्सृष्णावृतमानुषास्थिशकलप्रस्तार भारच्छदा मत्ता प्रेतवधूरिवोग्रचपला भूमिस्तदा लक्ष्यते ॥
इस योग में 'आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के [त सूर्यास्त के समय में' समुद्र के समीप छोटी इलायचो, लवलो और लौंग के वृक्षों को घुमाते हुये यदि नैऋत्य तरफ की हवा चले तो भूख, प्यास से मरे हुए मनुष्यों की हड्डियों के टुकड़े की विस्तृति के भार से व्याप्त पृथ्वी उन्मत्त और अति चहल प्रेतवधू को तरह दिखाई देती है।
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