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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 8
मेरुप्रस्तमरीचिमण्डलतले ग्रीष्मावसाने रवी वात्यामोदिकदम्बगन्धसुरभिर्वायुर्यदा चोत्तरः विद्यु‌द्भान्तिसमस्तकान्तिकलना मत्तास्तदा तोयदा उन्मत्ता इव नष्टचन्द्रकिरणां गां पूरयन्त्यम्बुभिः ॥
ष्म के अन्त में (आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन) मेह से आच्छादित सूर्य के किरण होने पर (सूर्यास्त समय में) अति सुगन्ध वाले कदम्बपुष्यों के गन्ध से सुगन्धित उत्तर तरफ की हवा चले तो उस वर्ष में बिजली से उत्पत्र सम्पूर्ण कान्तियों का स्वरूप ज्ञान होने के कारण उद्यम युत तथा उन्मत्त की तरह मेघ मेषों से नष्ट चन्द्रकिरण वाली पृथ्वी को जल से पूर्ण करता है।
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