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अध्याय 26 — अथाषाढीयोगाध्यायः

बृहत्संहिता
13 श्लोक • केवल अनुवाद
आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन उत्तराषाढा नक्षत्रगत चन्द्र के समय बराबर सब धान्यों को अभिमन्त्रित तराजू से अलग-अलग तौल कर रख दे। दूसरे दिन उन सबों को फिर तोले। जो धान्य बढ़ जाय उसकी उस वर्ष में वृद्धि और जो कम हो जाय उसको हानि होती है। तुला को अभिमन्त्रित करने के लिये समाससंहिता में मन्त्र दिया गया है, जो भट्टोत्पलविवृति में द्रष्टव्य है ।
मन्त्रयोग से सत्यरूपा सरस्वती देवी की उपासना करनी चाहिये। हे सत्यरूपे सरस्वति । ये परमार्थरूप यस्तु है, उसको तुम ही दिखा सकती हो
क्योंकि तुम सत्य व्रत वाली हो। जिस सत्य से चन्द्र, सूर्य, कुजादि ग्रह और नक्षत्रगण पूर्व दिशा में उदित होकर पश्चिम में अस्त होते हैं, जो सत्य सब वेदों में है
जो सत्य सब वेदों में है, जो सत्य ब्रह्मवादियों में है और जो सत्य तीनों लोकों में है, उसको दिखा दो।
तुम ब्रह्मा जी की पुत्री हो; पर आदित्या (अदिति की पुत्री) कहलाती हो, गोज से कश्यप गोत्र की हो और तुला के नाम से विख्यात हो ।
दश अङ्गल प्रमाण चार-चार सूत्रों से छः अङ्गुल प्रमाण शिक्यक वल ( दोनों पलदे के बलों) को बाँचे और दोनों पलड़ों के बीच में छः अङ्गुल प्रमाण कक्ष्य (डंडी) बाँचे।
दक्षिण तरफ के पलड़े पर सुवर्ण और उत्तर तरफ के पलड़े पर कूप, नदी या सरोवर के जल के साथ शेष द्रव्य का स्थापन करे। यदि प्रथम दिन की अपेक्षा द्वितीय दिन में कूप का जल बढ़ जाय तो अवृष्टि, नदी का जल बढ़ जाय तो मध्यम वृष्टि और सरोवर का जल बढ़ जाय तो उत्तम वृष्टि होती है।
गजदन्त के प्रमाण से हाथी का, गौ, घोड़ा, आदि ( गदहा, ऊँट, बकरी और पेड़) के लोम से क्रमशः उन सबों का, सुवर्ण से राजा का, मोम से ब्राह्मण आदि चारों वणों का, देश, वर्ष, मास और दिशाओं का तथा अपने-अपने प्रमाण से शेष द्रव्यों का शुभाशुभ ज्ञान करना चाहिये।
सुवर्ण का तुलादण्ड (डण्डी) श्रेष्ठ, चाँदी का मध्यम और इन दोनों के अलाभ में खैर की लकड़ी का तुलादण्ड बनाना चाहिये अथवा जिस बाण से कोई मनुष्य बेधित हुआ हो, उसका तुलादण्ड बनाना चाहिये। वह तुलादण्ड बारह अद्भुत प्रमाण का होना चाहिये।
दूसरे दिन में तोला हुआ द्रव्य अल्प हो तो उस वर्ष में उसका नाश, अधिक हो तो वृद्धि और समान हो तो मध्यम फल होता है। यह परम गोपनीय तुला का रहस्य मैंने कहा है। रोहिणी योगकाल में भी इसका विचार करना चाहिये ।
स्वाती, उत्तराषाढा या रोहिणी नक्षत्रगत चन्द्र के साथ यदि पापग्रह ( मंगल, शनि, राहु या केतु) का योग हो तो शुभ नहीं होता है।
तीनों (रोहिणी, स्वाती और आषाढी) भोगों का फल था दो योगों का फल समान हो तो निःसन्देह मही फल कहना चाहिये। यदि तीनों का अलग-अलग फल हो तो अधिकतर रोहिणी योग का फल ही उस वर्ष में कड़ना चाहिये ।
उक्त तोनों योगों के समय यदि पूर्व दिशा को हवा चले तो धान्यों को उत्तम निष्पत्ति, आग्नेय कोण की हवा चले तो अग्निकोप, दक्षिण दिशा की हवा चले तो थोड़ी दृष्टि, नैऋत्य कोण की हवा चले तो मध्यम वृष्टि, पश्चिम दिशा को हवा चले तो उत्तम वृष्टि, वायव्य कोण की हवा चले तो अधिक वृष्टि, उत्तर दिशा की हवा चले तो सुन्दर वृष्टि और ईशान कोण की हवा चले तो उत्तम वृष्टि होती है ।
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