Krishjan
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अध्याय 3 — तृतीयोऽध्यायः
ऐतरेय
14 श्लोक • केवल अनुवाद
उसने फिर विचार किया—
“अब मैं इन लोकों तथा उनके लोकपालों के लिए
अन्न
की सृष्टि करूँ।”
उसने
जल
को तपाया। उस तपे हुए
जल
से
एक स्थूल रूप
प्रकट हुआ। वह जो
मूर्त रूप
उत्पन्न हुआ, वही वास्तव में
अन्न
है।
उस
अन्न
को जब सृष्ट किया गया, तो वह उससे दूर भागने लगा—जैसे उसे निगल लेने का प्रयास हो रहा हो। तब उसने उसे
वाणी
द्वारा पकड़ने का प्रयास किया, पर वह
वाणी से पकड़ा नहीं जा सका
। यदि वह वाणी द्वारा पकड़ा जा सकता, तो मनुष्य केवल उसे बोलकर ही
तृप्त
हो जाता।
उसने फिर
प्राण
के द्वारा उसे पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन वह
प्राण से भी ग्रहण नहीं किया जा सका
। यदि वह प्राण द्वारा ही पकड़ा जा सकता, तो केवल श्वास लेकर ही मनुष्य
तृप्त
हो जाता।
उसने
चक्षु
(दृष्टि-इन्द्रिय)
के द्वारा उस
अन्न
को ग्रहण करने का प्रयास किया, किन्तु वह
आँखों द्वारा भी पकड़ा नहीं जा सका
। यदि वह केवल देखने से ही ग्रहण हो जाता, तो मनुष्य
देखकर ही तृप्त
हो जाता।
उसने
श्रोत्र
(श्रवण-इन्द्रिय)
द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, पर वह
श्रवण से भी पकड़ा नहीं जा सका
। यदि वह केवल सुनने से ही प्राप्त हो जाता, तो मनुष्य
सुनकर ही तृप्त
हो जाता।
उसने
त्वचा
(स्पर्श-इन्द्रिय)
द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, किन्तु वह
स्पर्श द्वारा भी पकड़ा नहीं जा सका
। यदि वह केवल स्पर्श से ही ग्रहण हो जाता, तो मनुष्य
छूकर ही तृप्त
हो जाता।
उसने
मन
के द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, पर वह
मन से भी पकड़ा नहीं जा सका
। यदि वह केवल मन से ही ग्रहण हो जाता, तो मनुष्य
ध्यान करके ही तृप्त
हो जाता।
उसने
शिश्न
(जननेंद्रिय)
के द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, पर वह
उससे भी पकड़ा नहीं जा सका
। यदि वह केवल उसी से ग्रहण हो जाता, तो मनुष्य केवल
विसर्जन/उत्सर्जन
के माध्यम से ही तृप्त हो जाता।
उसने उसे
अपान
के द्वारा ग्रहण करने का प्रयास किया, और वह
उसे भीतर खींचने में समर्थ हुआ
। यही वास्तव में
अन्न का ग्रहण
है—अर्थात् वह प्रक्रिया जो
वायु
(प्राणशक्ति)
द्वारा सम्पन्न होती है। और यही
वायु
ही वास्तव में
यह प्राण
है।
उस
पुरुष
ने विचार किया—
“यदि यह सब—वाणी से कहा गया, प्राण से लिया गया, चक्षु से देखा गया, श्रोत्र से सुना गया, त्वचा से स्पर्शित, मन से चिंतित, अपान से ग्रहण, शिश्न से उत्सर्जित—सब कुछ अलग-अलग मैं नहीं हूँ, तो फिर
मैं कौन हूँ?
”
अर्थात वह सभी
इन्द्रिय-व्यापारों
और
क्रियाओं
को एक-एक करके अस्वीकार करता हुआ उस निष्कर्ष पर पहुँचा कि—
“इन सभी अनुभवों से परे कोई एक अविभाज्य सत्ता है।”
उसने उस
सीमा
(सिर के भाग)
को भेदकर उसी
द्वार
से प्रवेश किया। वह
विदृति
(सूक्ष्म द्वार/छिद्र)
ही कहलाती है, और वही वास्तविक
आनंद का द्वार
है। उस (परम तत्त्व) के तीन
आवास-स्थान
बताए गए हैं और तीन
स्वप्न-अवस्थाएँ
भी— यह एक प्रकार का
अवस्था-भेद
है: यह
आवास
, यह
आवास
, यह
आवास
—अर्थात चेतना की विभिन्न स्थितियाँ उसी एक तत्त्व में स्थित हैं।
वह (आत्मा/पुरुष) उत्पन्न होकर समस्त
भूतों
को देखने लगा और सोचने लगा—
“यहाँ मेरे अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है?”
तब उसने उसी
पुरुष
को, जो
ब्रह्म के रूप में सर्वत्र व्याप्त
है, देखा—जो वास्तव में
अदृश्य होते हुए भी सर्वदर्शी
है।
इसलिए उसका नाम
“इदन्द्र”
हुआ, और वही वास्तव में
इन्द्र
कहलाया। उसे
इदन्द्र
के रूप में जानते हुए भी लोग उसे परोक्ष रूप में
“इन्द्र”
कहते हैं। क्योंकि
देवता
वास्तव में
परोक्षता
को प्रिय मानते हैं—वे सीधे नाम से नहीं, बल्कि संकेत और अप्रत्यक्ष भाषा में अधिक प्रतिष्ठित होते हैं।
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