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ऐतरेय • अध्याय 3 • श्लोक 9
तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्‌ तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतु। स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्वित्सृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत्‌ ॥
उसने उसे शिश्न (जननेन्द्रिय) के द्वारा पकड़ना चाहा, परन्तु शिश्न से उसे ग्रहण नहीं कर सका। यदि वह उसे शिश्न से पकड़ लेता, तो केवल उत्सर्जन करके ही अन्न से तृप्त हो जाता।
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