तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतु।
स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्वित्सृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
उसने शिश्न(जननेंद्रिय) के द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, पर वह उससे भी पकड़ा नहीं जा सका।
यदि वह केवल उसी से ग्रहण हो जाता, तो मनुष्य केवल विसर्जन/उत्सर्जन के माध्यम से ही तृप्त हो जाता।
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