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ऐतरेय • अध्याय 3 • श्लोक 4
तत् प्राणेनाजिघृक्षत्‌ तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम्। स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत्‌ ॥
उसने उसे प्राण के द्वारा पकड़ना चाहा, परन्तु प्राण से उसे ग्रहण नहीं कर सका। यदि वह प्राण से उसे पकड़ लेता, तो केवल श्वास लेकर ही अन्न से तृप्त हो जाता।
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