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ऐतरेय • अध्याय 3 • श्लोक 2
सोऽपोऽभ्यतपत् ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत्‌ ॥
उसने जल को तपाया। उस तपे हुए जल से एक स्थूल रूप प्रकट हुआ। वह जो मूर्त रूप उत्पन्न हुआ, वही वास्तव में अन्न है।
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