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ऐतरेय • अध्याय 3 • श्लोक 12
स एतमेव सीमानं विदर्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नाऽन्दनम्‌। सैषा विदृतिर्न्नामद्वास्तदेतन्नान्दनम्। तस्य त्रय आवसथाः स्त्रयः स्वप्नाः। अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥
उसने उस सीमा (सिर के भाग) को भेदकर उसी द्वार से प्रवेश किया। वह विदृति (सूक्ष्म द्वार/छिद्र) ही कहलाती है, और वही वास्तविक आनंद का द्वार है। उस (परम तत्त्व) के तीन आवास-स्थान बताए गए हैं और तीन स्वप्न-अवस्थाएँ भी— यह एक प्रकार का अवस्था-भेद है: यह आवास, यह आवास, यह आवास—अर्थात चेतना की विभिन्न स्थितियाँ उसी एक तत्त्व में स्थित हैं।
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