स एतमेव सीमानं विदर्यैतया द्वारा प्रापद्यत।
सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नाऽन्दनम्।
सैषा विदृतिर्न्नामद्वास्तदेतन्नान्दनम्।
तस्य त्रय आवसथाः स्त्रयः स्वप्नाः।
अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥
उसने उस सीमा(सिर के भाग) को भेदकर उसी द्वार से प्रवेश किया।
वह विदृति(सूक्ष्म द्वार/छिद्र) ही कहलाती है, और वही वास्तविक आनंद का द्वार है।
उस (परम तत्त्व) के तीन आवास-स्थान बताए गए हैं और तीन स्वप्न-अवस्थाएँ भी—
यह एक प्रकार का अवस्था-भेद है:
यह आवास, यह आवास, यह आवास—अर्थात चेतना की विभिन्न स्थितियाँ उसी एक तत्त्व में स्थित हैं।
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