स एतमेव सीमानं विदर्यैतया द्वारा प्रापद्यत।
सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नाऽन्दनम्।
सैषा विदृतिर्न्नामद्वास्तदेतन्नान्दनम्।
तस्य त्रय आवसथाः स्त्रयः स्वप्नाः।
अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥
उसने इस ही सीमा (सिर के भाग) को विदीर्ण करके, इसी द्वार से प्रवेश किया। इस द्वार का नाम ‘विदृति’ है; यही आनन्द का स्थान है।
उसके तीन निवास-स्थान हैं, और तीन स्वप्न (अवस्थाएँ) हैं।
— यह एक निवास है, यह एक निवास है, यह एक निवास है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
ऐतरेय के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।