स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति।
स ईक्षत यदि वाचाऽभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥
उसने विचार किया— ‘
मेरे बिना यह कैसे रह सकता है?’
फिर उसने सोचा—
‘मैं किस मार्ग से इसमें प्रवेश करूँ?’
उसने विचार किया—
‘यदि वाणी से कहा जाता है, यदि प्राण से श्वास लिया जाता है, यदि नेत्रों से देखा जाता है, यदि श्रोत्र से सुना जाता है, यदि त्वचा से स्पर्श किया जाता है, यदि मन से ध्यान किया जाता है, यदि अपान से ग्रहण किया जाता है, यदि शिश्न से उत्सर्जन किया जाता है — तब मैं कौन हूँ?’
पूरा ग्रंथ पढ़ें
ऐतरेय के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।