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ऐतरेय • अध्याय 3 • श्लोक 7
तत्त्वचाऽजिघृक्षत्‌ तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुम्। स यद्धैनत्त्वचाऽग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्‌ ॥
उसने उसे त्वचा (स्पर्शेन्द्रिय) से पकड़ना चाहा, परन्तु त्वचा से उसे ग्रहण नहीं कर सका। यदि वह उसे त्वचा से पकड़ लेता, तो केवल स्पर्श करके ही अन्न से तृप्त हो जाता।
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