उसने उसे अपान के द्वारा ग्रहण करने का प्रयास किया, और वह उसे भीतर खींचने में समर्थ हुआ।
यही वास्तव में अन्न का ग्रहण है—अर्थात् वह प्रक्रिया जो वायु(प्राणशक्ति) द्वारा सम्पन्न होती है।
और यही वायु ही वास्तव में यह प्राण है।
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