तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोतेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
उसने श्रोत्र(श्रवण-इन्द्रिय) द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, पर वह श्रवण से भी पकड़ा नहीं जा सका।
यदि वह केवल सुनने से ही प्राप्त हो जाता, तो मनुष्य सुनकर ही तृप्त हो जाता।
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