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ऐतरेय • अध्याय 3 • श्लोक 8
तन्मनसाजिघृक्षत्‌ तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुम्। स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्‌ ॥
उसने उसे मन के द्वारा पकड़ना चाहा, परन्तु मन से उसे ग्रहण नहीं कर सका। यदि वह उसे मन से पकड़ लेता, तो केवल ध्यान करके ही अन्न से तृप्त हो जाता।
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