तन्मनसाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
उसने मन के द्वारा उस अन्न को ग्रहण करने का प्रयास किया, पर वह मन से भी पकड़ा नहीं जा सका।
यदि वह केवल मन से ही ग्रहण हो जाता, तो मनुष्य ध्यान करके ही तृप्त हो जाता।
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