तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवानमत्रप्स्यत् ॥
उसने उसे नेत्र (चक्षु) से पकड़ना चाहा, परन्तु नेत्रों से उसे ग्रहण नहीं कर सका। यदि वह उसे नेत्रों से पकड़ लेता, तो केवल देखकर ही अन्न से तृप्त हो जाता।
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