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अध्याय 1 — तुलसी उपनिषद

तुलसी
16 श्लोक • केवल अनुवाद
अब तुलसी उपनिषद् का वर्णन किया जाता है। जिसके नारद ऋषि, अथर्वाङ्गिरस छन्द, अमृतरूपा तुलसी देवता, अमृत बीज, वसुधा (धरती) शक्ति एवं नारायण कीलक हैं। यह कृष्ण रंग (वर्ण) एवं कृष्ण शरीर वाली है। यह ऋग्वेद स्वरूपा, यजुर्वेद मन वाली, ब्रह्माथर्ववेद प्राण वाली, वेदांग एवं पुराणों में सुविख्यात (कल्प आदि वेदांग तथा पुराणों के द्वारा जिनकी महिमा का ज्ञान होता है), अमृत के द्वारा उद्भूत, अमृत रस मंजरी तुल्य, अन्त रहित, अनेक प्रकार के रस तथा भोग प्रदान करने वाली, दर्शन से पाप विनष्ट करने वाली, परम वैष्णव रूप, भगवान् विष्णु को प्रिय, आवागमन समाप्त करने वाली, स्पर्श करने से पावन बनाने वाली, अभिनन्दन करने से रोगों को समाप्त करने वाली, सेवन करने से मृत्यु नाशक, पूजन में भगवान् विष्णु को समर्पित करने से संकट निवारण करने वाली, भक्षण करने से प्राण शक्ति प्रदान करने वाली, प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करने से दरिद्रता का नाश करने वाली तथा मूल (जड़) की मिट्टी लगाने से महान् पापों का भंजन (विनाश) कर देने वाली है। (तुलसी की) गंध लेने से शरीरस्थ अन्तः के मल का विनाश करने वाली है। जो इस प्रकार से जानता है, वहीं सच्चा वैष्णव हैं। तुलसी को अनावश्यक नहीं तोड़ना चाहिए । जहाँ भी दिखाई पड़े, तुरन्त परिक्रमा करनी चाहिए। रात्रि में इसका (तुलसी का) स्पर्श न करे । पर्वो के दिन (तुलसी को) नहीं तोड़ना चाहिए। (पर्वो पर ) यदि कोई तोड़ता है, तो वह विष्णुद्रोही हो जाता है। विष्णु भगवान् को प्रिय अमृतरूपा श्रीतुलसी को नमस्कार है। श्रीतुलसी को हम (गुरु-शास्त्रानुसार) जानते हैं, विष्णु भगवान् को प्रिय श्रीतुलसी का ध्यान करते हैं। (इसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।) अमृतस्वरुपा (वह) हमें ( अमृत प्राप्ति के लिए) प्रेरित करे।
हे क्षीरसागर की कन्या! तुम अमृत हो और अमृतरूपा होकर अमृतत्व प्रदान करने वाली हो, इसलिए संसार-सागर से मेरा उद्धार करो।
हे लक्ष्मी जी की सखी! तुम आनन्दमय हो एवं सदैव विष्णु को प्रिय हो। इसलिए हे दुष्प्राप्य! तुम अपने हाथों में वर एवं अभय मुद्रा धारण करके (मेरी ओर कृपा की दृष्टि से) देखो।
हे तुलसी! अवृक्ष (चैतन्य रूप) होते हुए भी तुम वृक्ष रुप में दिखाई देती हो, (इसलिए) मेरी जड़ता (वृक्षत्व) का विनाश करो। हे अतुल रूप वाली! तुम्हारी कोई तुलना नहीं है, तुम जराविहीन हो, करोड़ों तुलनाओं से तुम्हारी तुलना नहीं की जा सकती।
हे अतुले! तुम्हारे समान केवल भगवान् विष्णु ही हैं, दूसरा कोई नहीं। तुम भगवान् विष्णु को प्रिय हो तथा संसार का पालन करने वाली हो।
तुम देवताओं द्वारा सेवित हो तथा मुक्ति प्रदान करने वाली हो। तुम्हारी जड़ में भगवान् विष्णु तथा छाया में लक्ष्मी का निवास होता है।
जिसके मूल में सभी देवता, सिद्ध, चारण, नाग एवं तीर्थ चारों तरफ से स्थित हैं तथा जिसके मध्य में ब्रह्म देवता निवास करते हैं।
जिसके मूल में सभी देवता, सिद्ध, चारण, नाग एवं तीर्थ चारों तरफ से स्थित हैं तथा जिसके मध्य में ब्रह्म देवता निवास करते हैं। जिनके अग्रभाग में वेद शास्त्रों का निवास है। उन तुलसी को मैं नमस्कार करता हूँ। हे तुलसी! तुम लक्ष्मी की सहेली, कल्याणप्रद, पापों का हरण करने वाली तथा पुण्यदात्री हो।
ब्रह्म के आनन्द रूपी आँसुओं से उत्पन्न होने वाली तुलसी तुम वृन्दावन में निवास करने वाली हो। नारद के द्वारा स्तुत्य आपको नमस्कार है, नारायण भगवान् के मन को प्रिय लगने वाली आपको नमस्कार है।
हे सर्वांगपूर्णे! तुम अमृतरूपी उपनिषद् रस रूप हो, इसलिए हे कल्याण करने वाली! महापाप रूपी दुस्तर समुद्र से हमारा उद्धार करो।
हे तुलसी! तुम समस्त पापों को प्रायश्चित्त रूप हो, (इसलिए) देवताओं, ऋषियों और पितरों को सदैव प्रिय हो।
जो ब्राह्मण श्राद्ध में तुलसी प्रयोग नहीं करते, वह श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुँचता है, व्यर्थ हो जाता है।
यदि कोई तुलसी पत्र के बिना भगवान की पूजा करता है, तो वह पूजा आसुरी हो जाती है, वह (पूजा) विष्णु भगवान् को प्रिय नहीं होती।
बिना तुलसी के यज्ञ, दान, जप, तीर्थ, श्राद्ध, तर्पण, मार्जन तथा देवार्चन आदि नहीं करना चाहिए।
तुलसी के मनकों को माला समस्त मनोकामनाओं को पूरा करने वाली है। इस प्रकार जो ब्राह्मण नहीं जानता, वह चाण्डाल से भी अधम है।
इस प्रकार यह तथ्य भगवान् नारायण ने ब्रह्माजी को बताया, ब्रह्माजी ने नारद और सनकादि ऋषियों को, सनकादि ने वेदव्यास को, वेदव्यास ने शुकदेव को बताया, शुकदेव ने वामदेव से कहा, वामदेव ने मुनियों को बताया तथा मुनियों ने मनुष्यों को बताया। जो इस प्रकार जानता है, वह स्त्री-हत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। वह वीर (भाई) हत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। वह ब्रह्म हत्या से मुक्ति पा लेता है। वह महाभय से छूट जाता है। वह महादुःख से मुक्त हो जाता है। शरीरान्त होने पर वैकुण्ठ लोक को प्राप्त करता है, (निश्चित रूप से) वैकुण्ठ लोक को प्राप्त करता है। ऐसी यह उपनिषद् है।
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