तुलसीपत्रमुत्सृज्य यदि पूजां करोति वै।
आसुरी सा भवेत् पूजा विष्णुप्रीतिकरी न च ॥
यदि कोई तुलसी पत्र के बिना भगवान की पूजा करता है, तो वह पूजा आसुरी हो जाती है, वह (पूजा) विष्णु भगवान् को प्रिय नहीं होती।
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