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तुलसी • अध्याय 1 • श्लोक 3
श्रीसखि त्वं सदानन्दे मुकुन्दस्य सदा प्रिये। वरदाभयहस्ताभ्यां मां विलोकय दुर्लभे ॥
हे लक्ष्मी जी की सखी! तुम आनन्दमय हो एवं सदैव विष्णु को प्रिय हो। इसलिए हे दुष्प्राप्य! तुम अपने हाथों में वर एवं अभय मुद्रा धारण करके (मेरी ओर कृपा की दृष्टि से) देखो।
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