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तुलसी • अध्याय 1 • श्लोक 4
अवृक्षवृक्षरूपासि वृक्षत्वं मे विनाशय । तुलस्यतुलरूपासि तुलाकोटिनिभेऽजरे ॥
हे तुलसी! अवृक्ष (चैतन्य रूप) होते हुए भी तुम वृक्ष रुप में दिखाई देती हो, (इसलिए) मेरी जड़ता (वृक्षत्व) का विनाश करो। हे अतुल रूप वाली! तुम्हारी कोई तुलना नहीं है, तुम जराविहीन हो, करोड़ों तुलनाओं से तुम्हारी तुलना नहीं की जा सकती।
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