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अध्याय 4 — चतुर्थः प्रश्नः

प्रश्न
11 श्लोक • केवल अनुवाद
तत्पश्चात् सौर्यायणी (सूर्यवंशी) गार्ग्य ने उनसे पूछा - भगवन्! इस 'सत्ता' (पुरुष) में कौन सोते हैं तथा कौन जागते हैं? कौन है यह देव जो स्वप्न देखता है अथवा किसका है यह सुख? किसमें ये सब विलीन (समाहित) हो जाते हैं?
ऋषि पिप्पलाद नें उसे उत्तर दिया - हे गार्ग्य! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्य की रश्मियाँ होती हैं, क्योंकि वे सभी उस तेजोमण्डल में एकीभूत होकर अस्त हो जाती हैं, किन्तु जब वह पुनः उदित होता है तो वे भी विचरण करती हैं, उसी प्रकार परमोच्च ईश्वर में मनुष्य की सशृण सत्ता, उसका मन भी, एकीभूत हो जाता है। इसी कारण उस समय यह सत्ता, यह पुरुष न देखता है, न सुनता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न उसे कुछ बोलना होता है, न कुछ ग्रहण करता है, न दान करता है, न आता है, न जाता है, वह किसी आनन्द का अनुभव नहीं करता। तब उसके सम्बन्ध में कहा जाता है 'वह सुप्त है'।
किन्तु इस सुप्त नगरी में प्राणाग्नियाँ ही जागती रहती हैं। अपान-वायु है गृहस्थ की अग्नि (गार्हपत्य अग्नि) तथा व्यान है गृहदेवता की अग्नि जो दक्षिण की ओर प्रज्वलित होती रहती है। मुख्य प्राणा-वायु है यज्ञ की पूर्वाग्नि; और जिस प्रकार पूर्वाग्नि अपना हवनीय (ईधन) पश्चिमाग्नि से ग्रहण करती है, उसी प्रकार मनुष्य की सुप्तावस्था में मुख्य प्राण-वायु अपान-वायु से ग्रहण करता है।
किन्तु समान-वायु है होता, आहुतिदाता; क्योंकि यही उच्छवास एवं निश्वास दोनों की आहुतियों को समानरूप में स्थिर करता है। मन है यजमान तथा उदान है यज्ञ का इष्टफल, क्योंकि यही दिन-प्रतिदिन यजमान को ब्रह्म के सान्निध्य में ले जाता है।
और, यह 'मन' स्वप्न में अपनी कल्पनाओं की महिमाओं में आनन्द अनुभव करता है। जो कुछ इसने देखा था मानों उसी को पुनः देखता है, और जो कुछ इसने सुना था, उसी को पुनः सुनता है; वस्तुतः भिन्न-भिन्न स्थानों एवं विभिन्न क्षेत्रों में इसने जो कुछ साक्षात् अनुभव किया था, सोचा था तथा जाना था, उस सबको अपनी स्वप्नावस्था में यह पुनः जीता है। जो कुछ इसने देखा था तथा जो कुछ नहीं देखा था, जो इसने सुना था तथा जो इसने नहीं सुना था, जो इसने जाना था एवं जो इसने नहीं जाना, जो है तथा जो सब नहीं है, सब, यह सब कुछ देखता है, कारण 'मन' ही 'विश्व' है।
किन्तु जब यह तेज (प्रकाश) से अभिभूत हो जाता है, तब यह 'मन 'यह' 'देव' स्वप्न नहीं देखता; तब इस शरीर में यह सुखभोग करता है।
हे सौम्य वत्स, जिस प्रकार पक्षीगण अपने आश्रय-वृक्ष की ओर उड़कर लौट जाते हैं, उसी प्रकार ये सब परमात्मा के अन्दर लौट जाते हैं।
पृथ्वी तथा पृथ्वी का अन्तर तत्त्व; जल तथा जल का अन्तर तत्व; तेज एवं तेज का अन्तर तत्त्व; वायु एवं वायु का अन्तर तत्त्व; एवं आकाश का अन्तर तत्त्व; चक्षु तथा उसका द्रष्टव्य, श्रोत्र उसका श्रोतव्य, घ्राण एवं घ्राण का विषय, रस (आस्वाद) एवं आस्वाद का विषय; त्वचा एवं स्पर्श के विषय; वाक् एवं वक्तव्य के विषय; दोनों हाथ तथा उनकी ग्रहण करने की प्रक्रिया, उपस्थ एवं उसके सुखभोग; वायु एवं उसकी विसर्जन प्रक्रिया; चरण एवं उनका गन्तव्य; मन तथा उसकी अनुभूतियाँ; बुद्धि तथा उसके बोद्धव्य विषय; अहंकार अहंकार की अनुभूतिः चित्त (सचेतन मन) एवं उसकी चेतना के विषय, तेज एवं वह जिसे यह तेज द्योतित (आलोकित) करता है; प्राण एवं वे पदार्थ जिन्हें प्राण धारण करता है।
यह जो द्रष्टा है, स्प्रष्टा है, श्रोता है, घ्राता (सूँघने वाला) है, रस ग्रहण करने वाला है, मनसा अनुभव करने वाला है, बोध करने वाला है, कर्ता है, विज्ञानात्मा अर्थात् विवेकात्मा है, वह है अन्तर 'पुरुष'। यह भी उस 'परतर-आत्मा' में, उस 'अक्षर' परमात्मा में समाहित हो जाता है।
जो उस छायाहीन, वर्णहीन, अशरीरी शुभ्रे एवं अक्षर 'चैतन्य', 'जिवात्मा' को जानता है, वह उस 'परम अक्षर', 'सर्वोच्च तत्त्व' को प्राप्त करता है। हे सौम्य वत्स, वह सर्वज्ञ मनुष्य स्वयं ही 'सर्वम्' बन जाता है। जिसके विषय में यह श्लोक (श्रुति-वचन) है।
हे सौम्य वत्स! जो उस 'अक्षर' तत्त्व को जानता है जिसमें विज्ञानात्मा, अर्थात् बोधात्मक चैतन्य, समस्त देवगण, प्राणवायु एवं सभी महाभूत समाविष्ट हो जाते हैं, वह सर्वज्ञ है, वह सम्पूर्ण 'विश्व' को जानता है।
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