तस्मै स होवाच। यथ गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति।
ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति।
तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥
उसके उत्तर में ऋषि ने कहा—
हे गार्ग्य, जैसे सूर्य के अस्त होते समय उसकी सभी किरणें उसके तेजोमण्डल में एकत्र हो जाती हैं, और पुनः उदय होने पर वे फिर फैल जाती हैं—उसी प्रकार यह संपूर्ण चेतना(इन्द्रिय-समूह)परम देव(मन/आत्मतत्त्व) में विलीन हो जाती है।
उस अवस्था में यह पुरुष न कुछ सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंद अनुभव करता है, न त्याग करता है, न गति करता है।
उस समय उसे केवल “स्वप्न में सोया हुआ” कहा जाता है।
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