एष हि द्रष्ट स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः। स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥
यह जो द्रष्टा है, स्प्रष्टा है, श्रोता है, घ्राता (सूँघने वाला) है, रस ग्रहण करने वाला है, मनसा अनुभव करने वाला है, बोध करने वाला है, कर्ता है, विज्ञानात्मा अर्थात् विवेकात्मा है, वह है अन्तर 'पुरुष'। यह भी उस 'परतर-आत्मा' में, उस 'अक्षर' परमात्मा में समाहित हो जाता है।
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