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प्रश्न • अध्याय 4 • श्लोक 3
प्राणाग्रय एवैतस्मिन्‌ पुरे जाग्रति। गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद् गार्हपत्यात्‌ प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥
किन्तु इस सुप्त नगरी में प्राणाग्नियाँ ही जागती रहती हैं। अपान-वायु है गृहस्थ की अग्नि (गार्हपत्य अग्नि) तथा व्यान है गृहदेवता की अग्नि जो दक्षिण की ओर प्रज्वलित होती रहती है। मुख्य प्राणा-वायु है यज्ञ की पूर्वाग्नि; और जिस प्रकार पूर्वाग्नि अपना हवनीय (ईधन) पश्चिमाग्नि से ग्रहण करती है, उसी प्रकार मनुष्य की सुप्तावस्था में मुख्य प्राण-वायु अपान-वायु से ग्रहण करता है।
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