यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः।
मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥
जो उच्छ्वास और निःश्वास(श्वास-प्रश्वास) दोनों को समभाव से संचालित करता है, वही समान वायु है।
मन वास्तव में यजमान है। उदान ही उस यज्ञ का इष्ट-फल है, जो उस यजमान को प्रत्येक दिन ब्रह्म की ओर ले जाता है।
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