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प्रश्न • अध्याय 4 • श्लोक 4
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥
किन्तु समान-वायु है होता, आहुतिदाता; क्योंकि यही उच्छवास एवं निश्वास दोनों की आहुतियों को समानरूप में स्थिर करता है। मन है यजमान तथा उदान है यज्ञ का इष्टफल, क्योंकि यही दिन-प्रतिदिन यजमान को ब्रह्म के सान्निध्य में ले जाता है।
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