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प्रश्न • अध्याय 4 • श्लोक 5
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पस्यति ॥
और, यह 'मन' स्वप्न में अपनी कल्पनाओं की महिमाओं में आनन्द अनुभव करता है। जो कुछ इसने देखा था मानों उसी को पुनः देखता है, और जो कुछ इसने सुना था, उसी को पुनः सुनता है; वस्तुतः भिन्न-भिन्न स्थानों एवं विभिन्न क्षेत्रों में इसने जो कुछ साक्षात् अनुभव किया था, सोचा था तथा जाना था, उस सबको अपनी स्वप्नावस्था में यह पुनः जीता है। जो कुछ इसने देखा था तथा जो कुछ नहीं देखा था, जो इसने सुना था तथा जो इसने नहीं सुना था, जो इसने जाना था एवं जो इसने नहीं जाना, जो है तथा जो सब नहीं है, सब, यह सब कुछ देखता है, कारण 'मन' ही 'विश्व' है।
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