अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पस्यति ॥
इस अवस्था में यह देव(चित्त/आत्म-प्रतिबिम्ब)स्वप्न में अपने ही महिमान का अनुभव करता है।
वह वहाँ देखे हुए को फिर देखता है, सुने हुए को फिर सुनता है, और देश-विदेश में अनुभव किए गए घटनाओं को पुनः पुनः अनुभव करता है। वह देखे और न देखे, सुने और न सुने, अनुभूत और अननुभूत, सत् और असत्—सबका अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है।
उस अवस्था में वह मानो सब कुछ देखता है और सब कुछ वही देखने वाला होता है।
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