स यथा सोभ्य वयांसि वसोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥
हे सौम्य वत्स, जिस प्रकार पक्षीगण अपने आश्रय-वृक्ष की ओर उड़कर लौट जाते हैं, उसी प्रकार ये सब परमात्मा के अन्दर लौट जाते हैं।
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