स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान् न पश्यत्यथ यदैतस्मिञ्शरीरे एतत्सुखं भवति ॥
किन्तु जब यह तेज (प्रकाश) से अभिभूत हो जाता है, तब यह 'मन 'यह' 'देव' स्वप्न नहीं देखता; तब इस शरीर में यह सुखभोग करता है।
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