पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च यादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहंकारश्चाहंकर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विद्यारयितव्यं च ॥
यहाँ प्रत्येक तत्त्व को उसके विषय के साथ जोड़ा गया है—अर्थ यह है कि संपूर्ण अनुभव-जगत् और उसकी क्रियाशील शक्तियाँ एक-दूसरे से अविभाज्य रूप में स्थित हैं।
पृथ्वी और उसका मात्रात्मक अनुभवजल और उसका अनुभव
तेज, वायु, आकाश और उनके अनुभव-रूप
इसी प्रकार—
चक्षु और दृश्यश्रोत्र और श्रव्यघ्राण और गंधरसना और रसत्वक् और स्पर्शवाणी और वक्तव्यहस्त और ग्रहणउपस्थ और आनंदपायु और विसर्जनपाद और गमन
तथा सूक्ष्म स्तर पर—
मन और चिंतनबुद्धि और निर्णयअहंकार और कर्तृत्व-भावचित्त और चेतनातेज और दीप्तिप्राण और उसकी जीवनी-शक्ति
अर्थ यह है कि संपूर्ण बाह्य और आन्तरिक जगत् अपनी-अपनी क्रिया और अनुभव-शक्ति सहित एक समग्र व्यवस्था में स्थित है, जिसका आधार आगे चलकर एक ही तत्त्व में बताया जाता है।
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