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अध्याय 2 — द्वितीयः प्रश्नः

प्रश्न
13 श्लोक • केवल अनुवाद
तत्पश्चात् वैदर्भी (विदर्भदेशीय) भार्गव ने उनसे पूछा - ''हे भगवन् कितने देवगण इस प्रजा को सम्भालते हैं, कितने इसे प्रकाशित करते हैं तथा इनमें सें पुनः कौन वरिष्ठ (सर्वाधिक शक्तिशाली) है?"
ऋषि पिप्पलाद ने उसे उत्तर दिया - "ये देवगण हैं - 'आकाश', 'वायु', 'अग्नि', 'जल' 'पृथ्वि', 'वाक्' 'मन', 'चक्षु' तथा 'श्रोत्र'। ये नौ देव प्रजा को प्रकाशित करते हैं; इसीलिए उन्होंने अभिमानपूर्वक कहा - 'हम', हम ही भगवान् के वाद्ययन्त्र को सहारा देते हैं तथा हम ही उसके संरक्षक हैं।"
उनमें वरिष्ठ (सर्वाधिक शक्तिशाली) 'प्राण' बोला - ''आप मोह-भ्रम में मत पड़िये; मैं स्वयं को ही पंचविध रूप में विभक्त करके भगवान् के इस वाद्ययन्त्र को सहारा देता हूँ, मैं ही इसका संरक्षक हूँ।'' किन्तु उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया।
अतएव वह क्रुद्ध होकर ऊपर की ओर उठने लगा वह शरीर से बाहर निकलने लगा। किन्तु जब प्राण शरीर से बाहर निकलता है तब उसके साथ अन्य सब भी बाहर निकलने लगते हैं, और जब प्राण प्रतिष्ठित (सुस्थिर) रहता है तो अन्य सभी प्रतिष्ठित सुस्थिर रहते हैं। जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधुकर-राजा के साथ होती हैं। जब वह बाहर जाता है, सब उसके साथ बाहर निकल जाती हैं तथा जब वह अन्दर बैठ जाता है, सब बैठ जाती हैं, ऐसा ही है 'वाक', 'मन', 'चक्षु' तथा 'श्रोत्र' के साथ भी। तत्पश्चात वे सब अति प्रसन्न हो गये तथा 'प्राण' का स्तुति गान करने लगे।
देखो यही वह है जो 'अग्नि' है तथा यही 'सूर्य' है जो तपता है यही 'वर्षा' है तथा यही इन्द्र है यही 'पृथ्वी' है यही 'वायु' है यही 'रवि' तथा 'देव है 'सत्' तथा 'असत्' एवं 'अमृतत्वं' यही है।
जिस प्रकार रथ के पहिये की नाभि में उसके सारे अरे मिलते हैं उसी प्रकार सब कुछ 'प्राण' में प्रतिष्ठित है, ऋग्वेद तथा यजुर्वेद तथा सामवेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणत्व (ब्रह्म) तथा क्षत्रियत्वं (क्षत्र)।
हे प्राण! आप प्रजापति के समान गर्भ में विचरण करते हैं तथा माता पिता से साम्य रखते हुए आप जन्म ग्रहण करते हैं। आप, जो प्राणों के द्वारा निवास करते हैं, यह प्राणिजगत् आपको यज्ञ-हवि अर्पित करता है।
सकल देवगणों में आप हैं सर्वाधिक बलवान् तथा उग्रतम और पितरों के लिए आप हैं प्रथम आहुति (स्वधा), आप ही हैं ऋषियों का सत्य एवं उनका सुचरित और आप हैं अंगिरस के पुत्रों में से अथर्वा।
हे प्राण! आप इन्द्र हैं अपनी तेजस्विता के कारण तथा रुद्र हैं क्योंकि आप परिरक्षण करते हैं; ज्योतिष्मान् नक्षत्राधिपति के समान आप सूर्य बनकर अन्तरिक्ष में विचरण करते हैं।
हे प्राण! जब आप वृष्टि बनकर बरसते हैं तब आपकी यह प्रजा आनन्द सें भर उठती है क्योंकि अब यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा।
हे प्राण! आप ही अपरिष्कृत रूपवाले हैं तथा आप ही 'अग्नि' एकमात्र पवित्रता हैं, आप ही सर्वभोक्ता हैं तथा सम्पूर्ण विश्व के स्वामी हैं हम आपको आपका भोज्य प्रदान करने वाले हैं क्योंकि हे मातरिश्वन्, आप हमारे 'पिता' हैं।
आपका जो देह वाणी में प्रतिष्ठित है, जो श्रोत्र एवं चक्षु में प्रतिष्ठित है और जो मन में विस्तीर्ण है उसे मंगलमय (शिव) बना दीजिये। हे प्राण! आप हमारे बीच से बाहर निकल कर मत जाइये।
यह सम्पूर्ण विश्व, यहाँ तक कि जो कुछ स्वर्गों में प्रतिष्ठित है, वह सब 'प्राण' के वश में है; जिस प्रकार माता अपने नन्हें पुत्रों की रक्षा करती है, उसी प्रकार हमारी रक्षा करिये; हमें सौभाग्य एवं सौन्दर्य (श्री) प्रदान करिये, हमें प्रज्ञा दीजिये।
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