तान् वरिष्ठः प्राण उवाच।
मा मोहमापद्यथ अहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥
उनमें वरिष्ठ (सर्वाधिक शक्तिशाली) 'प्राण' बोला - ''आप मोह-भ्रम में मत पड़िये; मैं स्वयं को ही पंचविध रूप में विभक्त करके भगवान् के इस वाद्ययन्त्र को सहारा देता हूँ, मैं ही इसका संरक्षक हूँ।'' किन्तु उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया।
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