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प्रश्न • अध्याय 2 • श्लोक 11
व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षरत्ता विश्वस्य सत्पतिः। वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥
हे प्राण! तू व्रात्य (सीमाओं से परे), एकर्षि (एकमात्र गतिदाता/द्रष्टा) और समस्त जगत् का सत्पति (सच्चा अधिपति) है। हम तेरे द्वारा प्राप्त अन्न के दाता हैं, और तू हमारा पिता है, हे मातरिश्वा (वायु/प्राणस्वरूप)!
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