यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥
हे प्राण! जब तू वर्षा के रूप में बरसता है, तब तेरी ये प्रजाएँ(समस्त जीव)आनंदमय अवस्था में स्थित हो जाती हैं, यह आशा करते हुए कि अब हमें अन्न प्राप्त होगा और हमारी कामनाएँ पूर्ण होंगी।
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