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प्रश्न • अध्याय 2 • श्लोक 7
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥
हे प्राण! तू ही प्रजापति के रूप में गर्भ में संचरण करता है, और तू ही पुनः जन्म लेता हुआ प्रतीत होता है। इन समस्त प्रजाओं द्वारा जो बलि (अर्पण) तुझे अर्पित की जाती है, वह वास्तव में तेरे लिए ही है, क्योंकि तू ही प्राणों के रूप में प्रतिष्ठित होकर इन सबका आधार बना हुआ है।
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