हे प्राण! तू ही प्रजापति के रूप में गर्भ में संचरण करता है, और तू ही पुनः जन्म लेता हुआ प्रतीत होता है।
इन समस्त प्रजाओं द्वारा जो बलि(अर्पण) तुझे अर्पित की जाती है, वह वास्तव में तेरे लिए ही है, क्योंकि तू ही प्राणों के रूप में प्रतिष्ठित होकर इन सबका आधार बना हुआ है।
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