या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरू मोत्क्रमीः ॥
जो तेरी शक्ति(तनू)वाणी में स्थित है, जो श्रोत्र में है, जो चक्षु में है, और जो मन में निरन्तर व्याप्त है—उस शिव(कल्याणकारी) स्वरूप को स्थिर रख, और कभी शरीर को त्याग कर न जा।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
प्रश्न के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।