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प्रश्न • अध्याय 2 • श्लोक 12
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि। या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरू मोत्क्रमीः ॥
जो तेरी शक्ति (तनू) वाणी में स्थित है, जो श्रोत्र में है, जो चक्षु में है, और जो मन में निरन्तर व्याप्त है—उस शिव (कल्याणकारी) स्वरूप को स्थिर रख, और कभी शरीर को त्याग कर न जा
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