सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रामत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते।
तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्टन्त एवम् वाङ्मनष्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥
जब प्राण अभिमानपूर्वक ऊपर उठने लगता है, तो उसके साथ ही अन्य सभी इन्द्रियाँ भी मानो प्रस्थान कर देती हैं। और जब वह स्थिर हो जाता है, तब वे सभी भी स्थिर हो जाती हैं।
जिस प्रकार मधुमक्खियाँ अपने मधुराज(रानी मधुमक्खी) के उड़ने पर उसके साथ उड़ जाती हैं और उसके बैठने पर उसके साथ बैठ जाती हैं, उसी प्रकार वाणी, मन, चक्षु और श्रोत्र—ये सभी प्राण की स्तुति करते हुए उसके अधीन रहते हैं।
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