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अध्याय 10 — अद्वैत
प्रबोधसुधाकर
14 श्लोक • केवल अनुवाद
'वह ब्रह्म मैं हूँ' जो भद्र पुरुष ऐसा जानता है वह यह सम्पूर्ण विश्वरूप हो जाता है, उसका पराभव (ब्रह्मात्मभाव से पतन) करने में देवगण भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा हो जाता है।
जो आत्मा से भिन्न किसी और देव की उपासना करता है और यह समझता है कि 'मैं अन्य हूँ और यह उपास्यदेव अन्य है, उसे आत्मज्ञान नहीं है, वह पशु के समान है' - ऐसी उपनिषद् तथा श्रुति की उक्ति है।
तथा भगवान ने भी कहा है कि 'ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है।' इसके अतिरिक्त इस विषय में यह युक्ति भी है-
अग्नि से दग्ध हो जाने पर टेढ़ी या सीधी जैसी भी लकड़ी हो, अग्निरूप हो जाती है; उसमें सीधा या टेढ़ा आकार रहता भी है तथापि क्या उसे हाथ से छू सकते हैं?
इसी प्रकार आत्मनिष्ठ पुरुष भी आत्माकार हो जाता है; वह देही-सा प्रतीत तो होता है तथापि होता शुद्ध आत्मामात्र ही है।
जिस प्रकार जल के अनेक शकोरों में एक ही सूर्य का प्रतिविम्ब पड़ता है उसी प्रकार यह एक ही परमात्मा अनेक देहों में भास रहा है।
दैवयोग से यदि एक शकोरा टूट जाय तो क्या उससे सूर्य का लय हो जाता है? जल की चञ्चलता के कारण प्रतिविम्ब के चलायमान होने से क्या सूर्य भी चञ्चल हो जाता है?
यह चराचर जगत् जैसे एक ही सूर्य के प्रकाश में अपने समस्त कार्य करता है, उसी प्रकार यह एक ही आत्मा की सत्ता से गतिशील हो रहा है।
जिस जल से केला, चम्पा और जाती आदि के पौधे बढ़ते हैं, उसी से सर्वथा भिन्न रस और गन्धवाले मूली, प्याज और लहसुन आदि भी पोषित होते हैं।
एक ही सूत्रधार स्वयं छिपा रहकर काष्ठ की अनेक पुतलियों को स्तम्भ के अग्रपट पर एक साथ नचाता रहता है।
जिस प्रकार एक ही ईख के गुड़, खाँड़ और शक्कर आदि नाना प्रकार के विकार होते हैं, तथा एक ही सुवर्ण के कङ्कण, केयूर आदि पृथक् पृथक् अनेक भेद होते हैं,
उसी प्रकार भिन्न-भिन्न स्वभाव, आकार और आचरण वाला उच्च और नीच जगत् एक ही आत्मा की सत्ता से प्रवृत्त हो रहा है।
मार्ग में जाने वाला पुरुष, जब तक कन्धे पर रखे हुए बने-बनाये भोजन को नहीं खाता, तभी तक उसके छूने का भय और क्षुधा की पीड़ा रहती है; उसको खा लेने पर वे दोनों ही नहीं रहते।
जो पुरुष हाथी, भैंसे, कुत्ते और शूकर आदि में एक ही जगदीश्वर को व्याप्त देखता है, वही अद्वैतानन्द का भोग करता है।
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