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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 10 • श्लोक 3
इत्युपनिषदामुक्तिस्तथा श्रुतिर्भगवदुक्तिश्च । ज्ञानी त्वात्मैवेयं मतिर्ममेत्यत्र युक्तिरपि ॥
तथा भगवान ने भी कहा है कि 'ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है।' इसके अतिरिक्त इस विषय में यह युक्ति भी है-
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