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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 10 • श्लोक 4
ऋजु वक्रं वा काष्ठं हुताशदग्धं सदग्नितां याति । तत्किं हस्तग्राह्यं ऋजुवक्राकारसत्त्वेऽपि ॥
अग्नि से दग्ध हो जाने पर टेढ़ी या सीधी जैसी भी लकड़ी हो, अग्निरूप हो जाती है; उसमें सीधा या टेढ़ा आकार रहता भी है तथापि क्या उसे हाथ से छू सकते हैं?
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