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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 10 • श्लोक 11
गुडखण्डशर्कराद्या भिन्नाः स्युर्विकृतयो यथैकेक्षोः । केयूरकङ्कणाद्या यथैकहेम्नो भिदाश्च पृथक् ॥
जिस प्रकार एक ही ईख के गुड़, खाँड़ और शक्कर आदि नाना प्रकार के विकार होते हैं, तथा एक ही सुवर्ण के कङ्कण, केयूर आदि पृथक् पृथक् अनेक भेद होते हैं,
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