जिस प्रकार एक ही ईख के गुड़, खाँड़ और शक्कर आदि नाना प्रकार के विकार होते हैं, तथा एक ही सुवर्ण के कङ्कण, केयूर आदि पृथक् पृथक् अनेक भेद होते हैं,
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