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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 10 • श्लोक 8
स्वव्यापारं कुरुते यथैकसवितुः प्रकाशेन । तद्वच्चराचरमिदं ह्येकात्मसत्तया चलति ॥
यह चराचर जगत् जैसे एक ही सूर्य के प्रकाश में अपने समस्त कार्य करता है, उसी प्रकार यह एक ही आत्मा की सत्ता से गतिशील हो रहा है।
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