स्कन्धधृतसिद्धमन्नं यावन्नाश्नाति मार्गगस्तावत् ।
स्पर्शभयक्षुत्पीडे तस्मिन्भुक्ते न ते भवतः ॥
मार्ग में जाने वाला पुरुष, जब तक कन्धे पर रखे हुए बने-बनाये भोजन को नहीं खाता, तभी तक उसके छूने का भय और क्षुधा की पीड़ा रहती है; उसको खा लेने पर वे दोनों ही नहीं रहते।
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