एवं पृथक्स्वभावं पृथगाकारं पृथग्वृत्ति ।
जगदुच्चावचमुच्चैरेकेनैवात्मना चलति ॥
उसी प्रकार भिन्न-भिन्न स्वभाव, आकार और आचरण वाला उच्च और नीच जगत् एक ही आत्मा की सत्ता से प्रवृत्त हो रहा है।
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