मानुषमतङ्गमहिषश्वसूकरादिष्वनुस्यूतम् ।
यः पश्यति जगदीशं स एव भुङ्क्तेऽद्वयानन्दम् ॥
जो पुरुष हाथी, भैंसे, कुत्ते और शूकर आदि में एक ही जगदीश्वर को व्याप्त देखता है, वही अद्वैतानन्द का भोग करता है।
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