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अध्याय 90 — अथ शिवारुताध्यायः

बृहत्संहिता
15 श्लोक • केवल अनुवाद
सियार फल में कुत्ते के समान है: विशेषता यह है कि शिशिर ऋतु में सियार को मद की प्राप्ति होती है। अतः उस समय इनका शुभाशुभ फल नहीं होता है। बोलने के अन्त में 'इहू' और इसके बाद 'टाटा' शब्द इनके पूर्ण स्वर है एवं इनसे अतिरिक्त शब्द दीप्त है।
लोमाशिका के स्वभाव से ही उत्पन्न होने वाले 'कक्कू शब्द पूर्ण हैं, इनसे अन्य स्वर स्वभाव-विरुद्ध और दीप्त है।
पूर्व और उत्तर दिशा में स्थित मृगाली शुभ फल देने वाली होतो है। सर्वत्र शान्त दिशा में स्थित हो तो श्रेष्ठ होती है तथा पूमित दिशा की तरफ मुख करके दीप्त शब्द करे तो उस दिशा के स्वामी का नाश करती है।
राजा, कुमार, सेनापति, दूत, सेठ, गुप्तचर, ब्राह्मण, राजाध्यक्ष- ये प्रदक्षिणक्रम से पूर्व आदि आठ दिशाओं के स्वामी होते हैं। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्राह्मण पूर्व आदि चार दिशाओं के स्वामी है।
सभी दिशाओं में दीप्त स्वर अशुभ होते हैं: किन्तु दिन में विशेष कर अशुभ होते है। नगर या सेनाओं में दक्षिण भाग में स्थित सूर्योन्मुखी सिया कह देती है।
यदि शिवा 'याहि' शब्द करे तो अग्निचय, 'टाटा' शब्द करे तो मृत्यु, 'धिक् पिक् शब्द करे तो अतिक और अग्निको ज्या मुख से निकालने माली गिदेशनाशको सूचित करती है।
काश्यप आदि मुनियों का मत है कि मुख से ज्वाला निकालने वाली शिवा का फल भयंकर नहीं है; क्योंकि लार के स्वभाव से सूर्य आदि की ज्वाला की तरह उसका मुँह भी ज्वालायुत होता है।
यदि अन्य शिवा के साथ दक्षिण भाग में स्थित शिवा शब्द करे तो फाँसी से मृत्यु को सूचित करती है। यदि अन्य शिवा के साथ पश्चिम भाग में स्थित वही शिवा शब्द करे तो जल से मृत्यु सूचित करती है।
यदि शिवा एक बार शब्द करके चुप हो जाय तो अनाकुलता, दो बार शब्द करके चुप हो जाय तो इष्टश्रवण, तीन बार शब्द करके चुप हो जाय तो अर्थलाभ, चार बार शब्द करके चुप हो जाय तो प्रिय का आगम, पाँच बार शब्द करके चुप हो जाय तो आकुलता, छः बार शब्द करके चुप हो जाय तो प्रधानों में भेद और सात बार शब्द करके चुप हो जाय तो सर्मत्त होती है।
इसके बाद आठ बार आदि शब्द अग्राह्य हैं। दक्षिण दिशा में छठे और पाँचवें फल को छोड़ कर शेष समस्त फलों को उलटा समझना चाहिये। जैसे एक बार शब्द करे तो क्षोभ, दो बार अनिष्ट-श्रवण, तीन बार करे तो धनहानि, चार बार करे तो प्रिय-वियोग, पाँच बार करे तो क्षोभ, छ: बार करे तो प्रधानों में भेद और सात बार करे तो सम्पत्ति की हानि होती है।
जिस शिवा के शब्द से मनुष्यों को रोमाञ्च हो, घोड़े मल-मूत्र का त्याग करें तथा मनुष्यों को भय हो, वह शिवा शुभ नहीं होती है।
जो बोलती हुई शिवा मनुष्य, हाथी और घोड़े के प्रतिशब्द से चुप हो जाय, वह सैन्य और नगर में मंगल करती है।
जो शिवा 'भेभा' शब्द करे तो भय, 'भोभो' शब्द करे तो मृत्यु और बन्धन तथा ' इ-हूं' शब्द करे तो सुनने वाले का श्रेय करती है ।
जो शिवा शान्त दिशा में स्थित होकर पहले अकार का उच्चारण करके बाद में 'आ' आदि वर्णों का उच्चारण करे या 'टाटा' शब्द करे या पहले 'टेटे' शब्द करके फिर 'धेधे' शब्द करे तो ये सभी प्रसत्रतापूर्वक उसके शब्द होते हैं और सभी शुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं।
जो शिवा बहुत जोर से पहले क्रूर वर्ण का उच्चारण करके बाद में शृगाल की तरह शब्द करे वह क्षेम, धन का लाभ और प्रिय-सपागम को सूचित करती है।
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