काश्यप आदि मुनियों का मत है कि मुख से ज्वाला निकालने वाली शिवा का फल भयंकर नहीं है; क्योंकि लार के स्वभाव से सूर्य आदि की ज्वाला की तरह उसका
मुँह भी ज्वालायुत होता है।
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