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अध्याय 76 — अथ कान्दर्पिकाध्यायः
बृहत्संहिता
12 श्लोक • केवल अनुवाद
गर्भधारण-काल में रक्त अधिक हो तो कन्या, शुक्र अधिक हो तो पुत्र और दोनों समान हों तो नपुंसक सन्तान की उत्पत्ति होती है; अतः वीर्य बढ़ाने वाले रसायन का सेवन कराना चाहिये।
प्रासाद के पृष्ठ, चन्द्रमा के किरण, नीलोत्पल, मद्य, मदालसा-प्रिया, वीणा, कामदेव की कथा, एकान्त, माला- ये सब कामदेव को बाँधने की रस्सियाँ हैं।
सोना, मक्खी, शहद, पारा, लौहचूर्ण, हरें, शिलाजीत, घृत-इन सबको सम भाग लेकर चूर्ण करके शहद या घृत के साथ इक्कीस दिन तक खाने से अस्सो वर्ष का वृद्ध भी युवा की तरह त्त्रो में रमण करता है।
कपिकच्छु (केर्वांच कबाडु) के जड़ को दूध में मिलाकर काढ़ा बना कर जो पान करता है, वह मनुष्य ती-प्रसंग करने में क्षीण नहीं होता तथा दूध से निकाले हुये पृत में उड़द को पकाकर उसको छः ग्राम खाकर ऊपर से दूध पीने से भी स्त्री-प्रसंग करने में पुरुष क्षीण नहीं होता है।
जिस पुरुष की बहुत लियाँ हो, वह बिदारीकन्द के चूर्ण में विदारीकन्द के रस की बार-बार भावना देकर सुखावे और उस चूर्ण को खाकर औटाया हुआ दूध में मिश्री मिलाकर पान करे।
आँवले के चूर्ण में आँवले के रस की चूर-बार भाषना देकर सुखाने के पश्चात् उसमें शहद या मिश्री मिलाकर चाटे और ऊपर से अपनी शक्ति के अनुसार दूध पीकर पुरुष पर्याप्त स्त्री-प्रसंग कर सकता है ।
बकरे के अण्ड को दूध में डाल कर काड़ा बनाने के बाद तिलों में उस दूध को भावना देकर उसे सुखाकर उन तिलों को खाकर ऊपर से दूध का पान करे तो उसके सामने चटक (गंवरा = गंवरैया) भी क्या कर सकता है?।
जिन रातों में घृत के साथ उड़द की दाल के साथ सट्टी के चावलों का भात खाकर जो ऊपर से दूध पीता है, यह उन रातों में कामदेव के साथ सोता है।
तिल, असगन्ध, क्यांच (कवा) का जड़, विदारीकन्द- इन सबों को बराबर लेकर चूर्ण बनाकर सबके तुल्य साठी के चावलों का आटा उसमें मिलाने के पश्चात् उसको बकरी के दूध में मथकर बकरी के घृत में ही बनाई गई उसकी पूरी प्रचुर शुक्र उत्पत्र करने वाली होती है।
गोक्षुरक (गोखरू) का चूर्ण या विदारीकन्द का चूर्ण खाकर ऊपर से दूध पान करने पर यदि यह चूर्ण पत्र जाय तो पुरुष ली-प्रसङ्ग से शीण नहीं होता है। यदि मन्दाग्नि के कारण नहीं पच सके तो पहले अग्निसन्दीपन के लिये वक्ष्यमान चूर्ण का सेवन करना चाहिये ।
अजवायन, नमक, हरें, सोंठ, पीपत-इन सबको सम भाग लेकर चूर्ण बनाने के पश्चात् उस चूर्ण को मद्य, तक, काठी या उष्ण जल के साथ सेवन करने से जठराग्नि दीपित होती है।
अधिक खट्टा, अधिक तीता, अधिक नमकीन, अधिक कटुआ ( लाल मिर्च आदि), अधिक खारा या अधिक शाक भोजन करने वाला युवा पुरुष भी दृष्टि, वीर्य और बल से रहित होकर वृद्ध की तरह लो-प्रसंग के समय अनेक व्याज करता है।
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