क्षीरं मृतं यः कपिकच्छुमूलैः पिवेत् क्षयं खीषु न सोऽ भ्युपैति । माषान् पयः सर्पिषि वा विपक्वान् षड्यासमात्रांश्च पयोऽ नुपानम् ॥
कपिकच्छु (केर्वांच कबाडु) के जड़ को दूध में मिलाकर काढ़ा बना कर जो पान करता है, वह मनुष्य ती-प्रसंग करने में क्षीण नहीं होता तथा दूध से निकाले हुये पृत में उड़द को पकाकर उसको छः ग्राम खाकर ऊपर से दूध पीने से भी स्त्री-प्रसंग करने में पुरुष क्षीण नहीं होता है।
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