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अध्याय 67 — अथ हस्तिलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
10 श्लोक • केवल अनुवाद
गजों की भद्र, मन्द, मृग और मित्र- ये चार जातियाँ होती हैं। उनमें प्रथमतः पठित भद्र जाति वाले गज का लक्षण इस प्रकार है- शहद के समान रंग के दाँत वाले, अवयवों के विभाग से परिपूर्ण, बहुत स्थूल, बहुत दुर्बल, कार्यक्षम, तुल्य अंगों से युत, धनुषाकार पृष्ठवंश (पीठ की हड्री वाले) तथा सूअर के समान वर्तुलाकार जानु और कमर वाले हाथी 'भद्र'संज्ञक होते हैं।
जिसके छाती और कक्षावलय (शरीर के मध्य का वलय) बोले हों, पेट लम्बा हो, स्यूल चमड़ा, कण्ठ, पेट और पूँछ के जड़ा हो तथा सिंह के समान दृष्टि हो, वह हाथी 'मन्द' संज्ञक होता है।
जिनके नीचले ओंठ, पूँछ के बाल और लिङ्गा छोटे हों, कण्ठ, दाँत, सूँड और कान छोटे हों तथा बड़ी आँख हों, वे हाथी 'मृग' संज्ञक होते हैं। पूर्वोक्त तीनों हाथियों के लक्षण मिश्रित रूप से जिनमें मिलते हैं, वे हाथी 'संकीर्ण' संज्ञक होते हैं।
मृग जाति वाले हाथों को ऊँचाई पाँच हाय, पूँछ से लेकर कुम्भ तब लम्बाई सात हाथ और मध्य की मोटाई आठ हाथ होती है। मृग की ऊँचाई आदि में एक-एक हाथ बढ़ाने से मन्द की और दो-दो हाथ बढ़ाने से भद्र की ऊँचाई आदि का प्रमाण होता है। संकीर्ण जाति के हाथियों की ऊँचाई आदि का प्रमाण अनिश्चित होता है।
भद्र जाति के हाथी का पद हरा, मन्द जाति का हल्दी के समान पीला, मृग जाति का काला और सङ्कीर्ष जाति के हाथी का पद मिश्रित वर्ष का होता है।
ताम्रवर्ण के ओंठ, सातु और मुख पाला, बरों में रहने वाले पक्षियों के समान नेत्र बाला, स्निग्ध और उक्त दाँत के अभाग बाला, विस्तीर्ण और दीर्घ मुख वाला, पनु के समान उबत, दीर्घ, निगूढ और निमा कये के समान
कुग्धों में एक-एक सूक्ष्म रोग वाला, जिलो कान, हनु नाभि, ललाट और लिङ्ग बाला, कये के समान अद्वारह या बीम नख वाला, बीन रेखाओं में युत, वर्तुलाकार मूड वाला तथा सुगन्धयुत महाईड वायु वाला हाथी शुभ होता है।
हाथियों के मुँह के अग्र भाग को 'पुष्कर' और पुष्कर के अग्र भाग को 'अंगुली' कहते हैं। जिनकी दीर्घ अंगुली लाल पुष्कर, जलपूर्ण मेघगर्जन के समान गलगर्जन, विस्तीर्ण दीर्घ और वर्तुलाकार ग्रीवा हो, ऐसे हाथी राजा के लिये शुभ होते हैं।
मदरहित, नख और अवयव हीनाधिक वाला, कुब्ज, मेदों की सीगों के समान दाँत वाला, जिसके अण्डकोश दिखाई दें, विना पुष्कर वाला, मलिन, नील, चित्र या कृष्ण तालु वाला,
मुखरोम वाला, विना दाँत वाला, षण्द, हाथी के लक्षण धाली गर्भयुत हथिनी-इन सभी हाथियों को राजा द्वारा परदेश में भेज देना चाहियेः क्योंकि ये सभी दुष्ट फल देने वाले होते हैं।
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