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बृहत्संहिता • अध्याय 67 • श्लोक 4
पश्ञ्चोन्नतिः सप्त मृगस्य दैर्य्यमष्टौ च हस्ताः परिणाहमानम् । एकद्विवृद्धावथ मन्दभद्रौ सङ्कीर्णनागोऽनियतप्रमाणः ॥
मृग जाति वाले हाथों को ऊँचाई पाँच हाय, पूँछ से लेकर कुम्भ तब लम्बाई सात हाथ और मध्य की मोटाई आठ हाथ होती है। मृग की ऊँचाई आदि में एक-एक हाथ बढ़ाने से मन्द की और दो-दो हाथ बढ़ाने से भद्र की ऊँचाई आदि का प्रमाण होता है। संकीर्ण जाति के हाथियों की ऊँचाई आदि का प्रमाण अनिश्चित होता है।
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